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Sunday, August 12, 2012

नैनीताल ( Nainital ) → प्रसिद्ध पर्वतीय नगर की रेलयात्रा (सुहाना सफ़र कुमाऊँ का.....1)

नमस्कार मित्रों ! अपनी पिछ्ली श्रृंखला  सुहाना सफ़र मनाली का    के समापन के बाद आज मैं एक नई श्रृंखला शुरू करने जा रहा हूँ → सुहाना सफ़र कुमाऊँ का ” । जैसा की हम जानते हैं कि भारत का सत्ताईसवाँ राज्य देवभूमि उत्तराखंड भारत के सबसे खूबसूरत और प्रकृति संपन्न राज्यों में एक हैं और प्रकृति में इसे अपने हाथो से बखूबी सवारा और संजोया हैं, या फिर यह कह लो कि उत्तराखंड में आकर हम लोगो को प्रकृति के विराट स्वरूप के दर्शन हो जाते हैं । उत्तराखंड राज्य को मंडल के आधार पर दो भागो में विभक्त किया गया हैं, पहला गढ़वाल और दूसरा कुमाऊँ । गढ़वाल मंडल में सात (देहरादून, उत्तरकाशी, हरिद्वार, रुद्रप्रयाग, चमोली, पौड़ी और टिहरी जिले) और कुमाऊँ मंडल में छह (नैनीताल, अलमोड़ा, पित्थौरागढ़, चम्पावत, उधमसिंह नगर और बागेश्वर जिले) जिले आते हैं । इस नई श्रृंखला में आपको अपने द्वारा की गयी उत्तराखंड के कुमाऊँ मंडल कुछ जगहों की यात्रा के बारे में अपना अनुभव कुछ कड़ियों के माध्यम से प्रस्तुत करूँगा । आज की इस कड़ी में, मैं आप लोगो को ले चलता हूँ →  दिल्ली से काठगोदाम की रेल यात्रा और काठगोदाम से नैनीताल की टैक्सी यात्रा पर ।

पेड़ पौधे के साये से नैनी झील का रूप ही निराला दिखता हैं………



Glimpse of beautiful Naini Lake  ( मन आत्मविभोर करती पहाड़ों बीच स्थित मनोहारी नैनी  झील )


हमेशा की तरह गर्मियों के मौसम में जब सूर्य देव अपनी प्रचंड गर्मी से भयाभय करने लगते हैं तो तब मन करता हैं कि इस स्थान को छोड़कर कही भाग जाए और कुछ दिनों के लिए किसी ठंडी जगह पर शरण ले ली जाये। ऊपर से बच्चो की गर्मियों की छुट्टियाँ आ गयी थी और उनका मन भी किसी ठन्डे इलाके में जाने को उकता रहा था । हमारे मन में भी घुमक्कड़ी के कीड़े ने कुल-बुलाना शुरू कर दिया तो तुरंत ही मैंने अपना विचार किसी पहाड़ी स्थल पर जाने का बनाया और साथ चलने के लिए नोयडा में रहने वाले अपने छोटे भाई अनुज से बात भी की । वह भी तुरंत अपने परिवार सहित हमारे साथ चलने को तैयार हो गया । इस बार हमारा विचार किसी टैक्सी या कार से न जाकर रेलगाड़ी से जाने का था । अब हमेशा की तरह वो ही पहला सवाल कि कब जाया जाए ?” तो भाई जाने की तिथि भी तय हो गयी  और अब दूसरा सवाल किकहाँ जाया जाये ?” तो सोचा कि इस बार हिमाचल प्रदेश के खूबसूरत हिल स्टेशन डलहौजी चलते हैं और पठानकोट तक रेलवे के वेबसाइट (www.irctc.co.in) पर ट्रेन में आरक्षण की जाँच की तो पाया अग्रिम आरक्षण निश्चित दिन और उसी दिन के आसपास की अन्य दिनों में भी उपलब्ध नहीं था । इस बार हमने अपना सारा ध्यान उत्तराखंड के कुमाऊँ की तरफ मोड़ दिया और काठगोदाम तक के लिए ट्रेन में आरक्षण की जाँच की तो उक्त तिथि को हम लोगो को रानीखेत एक्सप्रेस के शयनयान श्रेणी में पुरानी दिल्ली स्टेशन से पाँच सीटें उपलब्ध हो गयी और फटाफट आरक्षण करा दिया और अब बेसब्री से यात्रा के दिन की प्रतीक्षा करने लगे । वैसे नैनीताल मैं पहले भी दो बार आगरा से सीधे कुमाऊँ एक्सप्रेस से जा चुका हूँ, अब यह ट्रेन आमान परिवर्तन के कारण आगरा से कई सालो से बंद पड़ी हैं । इस बार हमने नैनीताल में कम और उसके आसपास की जगहो को अधिक घूमने का कार्यक्रम बनाया था, जिन्हें हमने आज तक नहीं घूमा था।

24-जून-2012 निश्चित तिथि को सुबह के पौने छह बजे हम लोग (मैं मेरा परिवार) आगरा से दिल्ली-नोयडा के लिए चल दिए । सबसे पहले हम लोग आगरा के भगवान टाकीज चौराहे पर पहुँचे और वहाँ पर हम लोगो को उत्तरप्रदेश परिवहन की बस दिल्ली (सराय-काले-खां) के लिए खड़ी मिल गई । हम लोगो के बस में सवार होने के बाद ठीक 6:15 पर बस वहाँ से दिल्ली के लिए रवाना हो गयी । आगरा से दिल्ली-नोयडा तक सफ़र का वर्णन मैं अपने एक पिछले लेख “Agra to Manali Via Noida/Delhi by Car” में कर चुका हूँ, जिसे आप लिकं पर क्लीक करके पढ़ सकते हैं । बस चालक ने इस 200 किमी० के सफ़र में कही भी बस को विश्राम करने के लिए नहीं रोका और हम लोग काफी कम समय में सफ़र तय करके दिल्ली के सराय-काले-खां और फिर लोकल बस से 11:30 बजे की आसपास हम लोग नोयडा स्थित अपने छोटे भाई के आवास स्थल पर पहुँच गये ।



रात को लगभग सवा नौ बजे के आसपास हम लोग खाना खाकर और कुछ खाना रास्ते के लिए पैक करके पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के लिए चल दिए । सबसे पहले हम लोग ऑटो से नोयडा के सेक्टर 16 के मेट्रो स्टेशन पहुंचे और काउंटर से चांदनीचौक के लिए मेट्रो के टिकट ख़रीदे मेट्रो में सवार होकर हम लोग वहां राजीव चौक पहुंचे और फिर वहाँ लाइन बदल कर दूसरी मेट्रो से हम लोग 10:15 बजे के आसपास तक चांदनीचौक पहुँच गए । पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन चांदनीचौक मेट्रो स्टेशन से अंदर के रास्ते से कुछ कदम की ही दूरी पर था । स्टेशन पहुँचने पर मालूम किया तो पता चला कि रानीखेत एक्सप्रेस प्लेटफार्म न०12 पर अपने निर्धारित समय 10:40 से दस मिनिट लेट आएगी, अब आप सोच रहे होगे कि गाड़ी जब बनती यहाँ से तो लेट का क्या मतलब तो आपको बता दूँ की यह गाड़ी अजमेर से आती हैं और फिर यहाँ से दुबारा बनकर काठगोदाम के लिए चलती हैं । अभी समय काफी था सो हम लोग आराम से अपना सामान लेकर ओवरब्रिज के रास्ते से प्लेटफार्म न०12 पहुँच गए । इस समय प्लेटफार्म पर बहुत अधिक भीड़ थी, मुश्किल से अपना सामान एक खाली जगह देखकर टिकाया और गाड़ी कि प्रतीक्षा में स्टेशन पर टहलते रहे थे । हमारी भारतीय रेलवे में अक्सर होता रहता हैं, कि एन वक्त पर गाड़ी का प्लेटफार्म बदल दिया जाता हैं और फिर यात्रीगण अपना सारा सामान समेटकर कर दूसरी प्लेटफार्म की ओर भागता हैं । ऐसा ही कुछ हमारी प्रतीक्षारत ट्रेन के लिए भी उदघोष हुआ कि, यात्रीगण कृपया ध्यान दे, पुरानी दिल्ली से चलकर मुरादाबाद, रामपुर के रास्ते काठगोदाम जाने वाली गाड़ी संख्या 15013 रानीखेत एक्सप्रेस प्लेटफार्म न०12 के स्थान पर अब प्लेटफार्म न०13 आएगी,आपको हुई इस असुविधा के लिए हमे खेद हैं हमारे साथ गनीमत यह रही की प्लेटफार्म न०12 और 13 एक ही पर थे, बस हम लोगों ने फटाफट अपना सारा सामान समेटकर प्लेटफार्म न०13 पहुँच गए ।
Ranikhet Express at Platfrom No. 13, Old Delhi Railway Station (रानीखेत एक्सप्रेस)
प्लेटफार्म पर खड़ी रानीखेत एक्सप्रेस



रानीखेत एक्सप्रेस 10:50 बजकर प्लेटफार्म पर आ गयी और हम लोग अपना सही डिब्बा ढूढने के बाद अपनी आरक्षित सीट पर बैठ गए । ट्रेन के अंदर बहुत गर्मी थी,  दस मिनिट के पश्चात गाड़ी ने धीरे-धीरे स्टेशन से सरकते हुए गति पकड़ ली, और ट्रेन की खिड़की ठंडी हवा का आवागमन शुरू हुआ । गाड़ी चलते ही हम लोगो ने अपना सारा सामान सीट के नीचे लगा दिया और एक लोहे की जंजीर से लॉक कर दिया । थोड़ी देर बाद बच्चो भूख लगी तो उन्हे खाना खिलाकर कर हम लोग रेल यात्रा का आनन्द लेते रहे, हमारे दोनों बच्चे सबसे ऊपर की सीट पर पहुँच गए । कुछ देर बाद टी.टी टिकिट चेक करने आ गया, टिकिट मेरे छोटे भाई के मोबाइल में SMS रूप में थी और उसने इस SMS से हमारी आरक्षित सीट को चेक करा दिया । एक सीट हमारे तरफ की खाली थी जिसे टी.टी. ने सौ रूपये लेकर हमारे सामने बैठे प्रतीक्षारत एक व्यक्ति को आवंटित कर दी । हम लोगो ने काफी समय आपस में बात करते हुए बिता दिया और जब बैठे-बैठे थक गए तो आराम करने के लिए सभी लोग अपनी सीट पर पहुँच गए पर मैं खिड़की पास ही बैठा रहा और ठंडी हवा का आनन्द लेने के साथ-साथ खिड़की से बाहर रात के अँधेरे में देखने का असफल प्रयास भी करता रहा । किसी झूले की तरह हिलती-डुलती और आवाज करती हुई ट्रेन के शोर के बीच हल्की सी नींद भी आने लगी थी । जब हल्की से नींद लेने का प्रयास करते तभी अचानक से तेज हवा के झोके के साथ दूसरी रेल लाइन से तेज सिटी की आवाज के साथ दूसरी ट्रेन विपरीत दिशा से गुजर जाती और नींद उचट जाती थी । बीच-बीच में ट्रेन के शोरगुल के मध्य कही-कही से गाड़ी की सिटी की आवाज भी सुनाई दे जाती तो मन में एक पुराना गीत → “ गाड़ी बुला रही हैं , सिटी बजा रही हैं   याद आ जाता । जब ट्रेन अपने किसी ठहराव वाले स्टेशन रूकती तो रात के सन्नाटे में बाहर से एक आवाज अक्सर सुनाई देती चाय-चाय गर्म चाय और चाय बेचने वाले खिड़की से आवाज लगाते साहब ! चाय दूँ क्या ? ” और हम कह देते,” नहीं चाहिये भाई !



रात के समय यदि कही वीराने में ट्रेन रुक जाती तो यह जानने की तीव्र इच्छा होती थी कि ट्रेन कहां तक पहुँच गयी और हमारी मंजिल अभी कितनी दूर और हैं तो यही जानने के लिए मैं अपने मोबाइल का GPS शुरू करके उसमे से सारी जानकारी हासिल कर लेता था । GPS एक अच्छा उपकरण या सोफ्टवेयर जो हमें अपनी वर्तमान की सारी भौगोलिक और रास्ते की जानकारी बखूबी हमको उपलब्ध करता हैं इसी तरह ट्रेन कई स्टेशनों पर रुकते-रुकाते चलती रही, इस बीच ट्रेन अपने निर्धारित समय से लगभग एक घंटा विलंब भी हो गयी और कई जगह बेहद धीमे चल से चलती रही । हद तो तब हो गयी जब रात के दो बज रहे थे और ट्रेन मुरादाबाद स्टेशन पर खड़ी हो गयी और चलने का नाम नहीं ले रही थी । उसी बीच सामने के प्लेटफार्म से कई ट्रेन गुजर गई जैसे हमें चिढ़ा रही हो तुम यही खड़ें ही रहो हम तो चले अपने सफ़र पर ।



काफी देर ट्रेन के ठहराव के करण गाड़ी में अंदर बैठे मुसाफिर गर्मी से कुलबुलाने लगे और बाहर टहल रहे लोगो से ट्रेन की देरी का कारण पूछते रहे, किसी को कोई कारण मालूम हो, तभी तो जबाब देता । मैं भी ट्रेन की अंदर की गर्मी से तंग आकर गाड़ी से बाहर आया गया और प्लेटफार्म पर टहलने लगा तभी पास खिड़की से एक महिला की आवाज आयी,” भैया ! रामपुर आ गया क्या ? ” मैंने कहाँ ,”अभी नहीं! अभी गाड़ी मुरादाबाद स्टेशन पर हैं । उस महिला ने फिर कहाँ, “अब तक तो गाड़ी रामपुर होने चाहिए, यह गाड़ी लेट क्यों हो रही हैं और यहाँ पर इतनी देर से क्यों खड़ी हैं ।मैंने कहाँ, “मुझे कारण नहीं मालूम”, और मन में कहाँ,” क्या कारण बताऊँ इनको, ट्रेन ड्राइवर तो हूँ नही मैं, जो सही कारण इनको बता सकूं। करीब दो घंटे के लंबी प्रतीक्षा के बाद लगभग सुबह के चार बजे हरा सिग्नल हुआ, गाड़ी ने जोर से सीटी दी और धीरे-धीरे अपने स्टेशन से आगे कि तरफ खिसकना शुरू कर दिया । जल्दी से अंदर आकर गाड़ी में अपने सीट पर बैठने के बाद मैं मन इस ट्रेन को कोसने लगा की यह गाड़ी तो पैसंजर ट्रेन से भी गयी बीती हो गयी हैं, जहाँ मन चाहा काफी देर रोक दिया जाता है । धीरे-धीरे रात का अँधेरा छंटने लगा और सुबह का उजाले की लालिमा दिखने लगी थी और अब खिड़की से बाहर का दूर तक नजारा, खेत, खलिहान, रेल पटरियों के किनारे के बने घर, फैक्ट्रिया आदि सब कुछ दिखने लगा था । एक स्टेशन पर गाड़ी रुकने पर हमने बाहर से चाय लेकर सुबह का शुभारंभ किया और बाकी का समय खिड़की से बाहर के नजारे देखते हुए ही बिता दिया ।

A Picture of Kathgodam Station ( काठगोदाम रेलवे स्टेशन )

25-जून-2012 दूसरे दिन ठीक सवा आठ बजे हमारी ट्रेन काठगोदाम स्टेशन पहुँच गयी, रानीखेत एक्सप्रेस का यहाँ पहुँचने का समय सुबह के 5:05 का था, इसका मतलब यह ट्रेन तीन घंटे से भी ऊपर लेट हो गयी थी । हमने रेलवे को फिर कोसा कि रेलवे प्रशासन को तनिक भी यात्रियों के समय की कद्र ही नही हैं, गाड़ी लेट होने से कितने ही लोगो का काम खराब हो जाता होगा । खैर हमने अपना सारा सामान समेटा और ट्रेन से बाहर आ गए । अब हमें यहाँ से नैनीताल जाना था; जो कि काठगोदाम रेलवे स्टेशन से NH87 (NH87* → रामपुर से कर्णप्रयाग तक) होते हुए करीब 34 किमी० दूरी पर था । नैनीताल पहुँचने के लिए स्टेशन से लोकल टैक्सी की काफी अच्छी व्यवस्था थी । हम लोग अपना सामान लेकर स्टेशन से बाहर जा रहे थे, तभी एक टैक्सी वाला आया और बोला, “आप नैनीताल जाओगे?” हमने कहाँ,” हाँ भाई ! कितना लोगो नैनीताल तक का ?” उसने कहाँ, “पांच सौ रूपये लगेंगे !हमने कहाँ,” हम तो चार सौ रूपये ही देगें!पर वो चार सौ रूपये में जाने को तैयार नहीं हुआ ।  कुछ देर बाद ही दूसरे टैक्सी वाले एक सरदार जी आये और वह चार सौ रूपये में नैनीताल चलने के लिए तैयार हो गया । इस समय पहाड़ों पर सीजन होने के कारण हमारे हिसाब से यह टैक्सी का किराया भी काफी महंगा था, यदि ऑफ सीजन होता तो यही टैक्सी किराया नैनीताल तक का 250 से 300 रूपये तक होता, पर क्या करे सीजन में घूमना हैं तो इस महंगाई को भी झेलना पड़ता हैं । स्टेशन से बाहर आकर टैक्सी में हमने अपना सामान रखा और बैठ कर नैनीताल की ओर चल दिए । सरदार जी ने हमें बताया कि नैनीताल में अब टैक्सी के रूप में डीजल के मुकाबले पेट्रोल गाड़ी को ही टैक्सी के रूप में ही मान्यता है, इसलिए यहाँ पर अधिकतर पेट्रोल गाड़ी ही टैक्सी के रूप में मिलेगी और भाड़ा भी थोड़ा महंगा पड़ता हैं । हमने कहा यह तो अच्छी बात हैं, इससे तो पर्यावरण भी काफी हद तक प्रदूषण से सुरक्षित रहेगा ।


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On the way of Nanital City ( हरे-भरे पहाड़ी रास्ते की शुरुआत)
Beautiful Pine Tree at Road Side on the Way of Nainital ( पाइन वृक्षों के साथ एक खूबसूरत नजारा )
 


काठगोदाम से कुछ किलोमीटर चलने के बाद पहाड़ दिखने लगे और समतल रास्ता धीरे-धीरे पहाड़ी रास्ते में बदलना शुरू हो गया । अब हमारी गाड़ी नैनीताल के सुन्दर, गड्डे रहित, नागिन से बलखाती, हरे-भरे पहाड़ों के बीच चौड़े मार्ग (हाइवे) पर दौड़ रही थी । पहाड़ी रास्ते के खाई किनारे काफी खूबसूरती से रंग किये हुए सीमेंट के सुरक्षा चौक, रात में चमकने वाले चिन्ह बने हुए हुए थे । जैसे-जैसे हम लोग नैनीताल के तरफ बढ़ते जा रहे थे वैसे-वैसे मौसम में भी बदलाव शुरू हो गया था । अब मौसम पहले के अपेक्षाकृत काफी ठंडा और सुहावना हो गया था,  हवा भी ठंडी चल रही थी ।


A View of Nainital Road Side ( बच्चो ने कहाँ कि हमारी भी फोटो खींचो इस पर बैठाकर)

Beautiful Road View toward the Nainital ( पहाड़ों पर चढ़ाई के समय सुन्दर रास्ते का नजारा )



लगभग आधा घंटा चलने के बाद हमें कुछ परेशानी आने के कारण थोड़ी देर के लिए टैक्सी को हाइवे के किनारे एक सुन्दर सी जगह पर गाड़ी रोक लिया । गाड़ी से बाहर आकार हम लोग में पहाड़ों का और तेज गति से चल रही ठंडी हवा का आनन्द लेने लगे । घाटी में और सड़क के किनारे हरे-भरे पाइन के पेड़ बहुत ही सुन्दर नजारा प्रस्तुत कर रहे थे । कुछ खूबसूरत फोटो मैंने इसी विश्राम के समय पहाड़ों, पाइन वृक्ष और नागिन से बलखाती सुन्दर सड़क के खींचे जिसे मैंने लेख में लगाये हैं लगभग दस मिनिट सड़क किनारे की वादियों में बिताने के पश्चात हम लोग नैनीताल की ओर चल दिए ।

Beautiful Pine Trees on the Midway (बड़े ही सुन्दर लगते हैं पहाड़ी पेड़,पौधे )

Road View toward the Kathgodam (पहाड़ों के बीच नागिन सी बलखाती सुन्दर पहाड़ी सड़क)


रास्ते में हमने सरदारजी से अपने घूमने के कार्यक्रम पर बातचीत शुरू की और अपनी आगे की कुमाऊँ यात्रा के कुछ जगह घूमने की योजना भी बताई । नैनीताल से आगे का घूमने का हमारा कार्यक्रम करीब तीन दिनों का था । अपनी योजना बताने के बाद हमने सरदारजी से इस यात्रा के लिए टैक्सी भाड़ा पूछा तो सरदारजी जी ने हमें अपना मोबाईल नंबर देकर कहाँ कि आप शाम को मालुम कर लेना, मैं आपको इस यात्रा का टैक्सी भाड़ा बता दूँगा और यह भी बता दूँगा की यह तीन दिनों में हो जाएगा की नहीं । अब आपको अपने तीन दिनों के कुमाऊँ घूमने की योजना भी बता देता हूँ । हमारी योजना नैनीताल से श्री कैची धाम, रानीखेत, कौसानी, बैजनाथ, पाताल भुवनेश्वर, जागेश्वर और अल्मोड़ा होते हुए वापिस नैनीताल आने की थी ।




इसी बीच हम लोग बातचीत करते हुए नैनीताल पहुँच गए । सरदार जी ने हमें नैनीताल बस स्टैंड से कुछ २०० मीटर पहले एक कमरा किराए पर लेने के हेतु दिखाया । यह कमरा दो मंजिल ऊपर और कुछ गन्दी से जगह पर था जो हमें बिल्कुल भी पसंद नहीं आया और हाँ किराया पूछा तो बताया पूरे दो हजार रूपये । हम तो चौंक गए की यदि इस नापसंद और छोटे से कमरे का किराया दो हजार हैं तो नैनीताल के अच्छी और मुख्य जगह पर तो कमरे और भी महंगे मिलेंगे । सीजन अपने चरम पर होने के कारण हमने अपने मन में बैठा लिया कि अब हमें नैनीताल काफी महंगा पड़ने वाला हैं । हमने सरदारजी से कहा की आप हमें आगे अपने टैक्सी के ठहराव पर उतार  दो, हम लोग अपना कमरा स्वयं ढूंढ लेंगे । उसने हमें नैनीताल में तल्लीताल के बस स्टैंड से कुछ कदम पहले काठगोदाम रोड पर ही उतार दिया । हम लोगो ने अपना सामान समेटा और वहाँ से पैदल ही सामान लेकर चल दिए । थोड़ा पैदल चलने के बाद बस स्टैंड के सामने हमारा अभिवादन करती हुयी सुन्दर और विराट हरे पानी से परिपूर्ण नैनी झील नजर आयी । झील में तैर रही नावे बड़ी ही प्यारी लग रही थी । नैनीताल का मौसम और माहौल का तो क्या कहना, बिल्कुल शांत,  ठंडा और सुहावना । हम लोग वही किनारे से खड़े होकर काफी देर तक नैनी झील के मनोहारी द्रश्य को निहारते रहे ।


First glimpse on Naini Lake at TalliTal Side (नैनीताल पहुँचने पर नैनी झील के विराट दर्शन )

अब मैं आज के इस लेख को अब यही विराम देता हूँ । जल्द ही मिलता हूँ फिर अपनी इस कुमाऊँ श्रृंखला की अगली यादगार यात्रा लेख के नई कड़ी के साथ । अगले लेख में मैं आप लोगो को शहर के विभिन्न स्थल "नैनीताल के दर्शन" पर ले चलूँगा । आपको आज का यह लेख कैसा लगा, आपकी प्रतिक्रिया और सलाह का हमेशा स्वागत हैं । अगले लेख तक के लिए आप सभी को धन्यवाद और राम -राम ! 
क्रमशः ...........
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Table of Contents  कुमाऊँ यात्रा श्रृंखला के लेखो की सूची :
4. भीमताल → सुन्दर टापू वाली कुमायूं की सबसे बड़ी झील (सुहाना सफ़र कुमाऊँ का…..4)  
5. नौकुचियाताल→ नौ कोने वाली सुन्दर झील ( (सुहाना सफ़र कुमाऊँ का…..5)   
6. सातताल → कुमाऊँ की सबसे सुन्दर झील  (सुहाना सफ़र कुमाऊँ का…..6)
7. नैनीताल → माँ नैनादेवी मंदिर और श्री कैंची धाम (सुहाना सफ़र कुमाऊँ का…..7)   
8. रानीखेत → हिमालय का खूबसूरत पर्वतीय नगर (सुहाना सफ़र कुमाऊँ का…..8) 
9.  कौसानी → प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर पर्वतीय नगर (सुहाना सफ़र कुमाऊँ का.....9)
10. बैजनाथ (उत्तराखंड)→भगवान शिव को समर्पित अति-प्राचीन मंदिर (सुहाना सफ़र कुमाऊँ का.....10) 
11. पाताल भुवनेश्वर → हिमालय की गोद में एक अद्भुत पवित्र गुफा (सुहाना सफ़र कुमाऊँ का.....11) 
12. जागेश्वर धाम → पाताल भुवनेश्वर से जागेश्वर धाम यात्रा (सुहाना सफ़र कुमाऊँ का.....12) 
13. जागेश्वर (ज्योतिर्लिंग)→कुमाऊं स्थित भगवान शिव का प्रसिद्ध धाम के दर्शन (सुहाना सफ़र कुमाऊँ का.....13) 

14. नैनीताल → खूबसूरत नैनी झील और सम्पूर्ण यात्रा सार (सुहाना सफ़र कुमाऊँ का.....14)

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21 comments:

  1. रितेश जी हमेशा की तरह सुन्दर चित्र सुन्दर लेखन, क्या खूब. वन्देमातरम..

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    1. धन्यवाद प्रवीण जी....वन्देमातरम

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  2. पिछले अक्टूबर में दिल्ली से सड़क मार्ग से हमलोग नैनीताल कौसानी और बिनसर गए थे। उसके बारे में लिखना अभी बाकी है। चलिए अभी आपकी ही सुन लेते हैं।

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    1. मनीष जी....आप आपने नैनीताल कौसानी यात्रा का वर्णन जल्द ही लिखना ....मुझे प्रतीक्षा रहेगी...

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  3. bhai kausani mere work area mai aata hAI. phir kabhi aao to yaad kariyega.

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    1. नमस्कार हरी शर्मा जी....
      आपके बारे में मैं पहले भी दर्शन जी के नैनीताल के लेख में पढ़ चूका हू......
      हमारी टैक्सी जब खराब हुई थी तब हमने उसे शोमेश्वर में एक दुकान पर दिखाया था पर वहाँ हमारी टैक्सी सही नही हुई थी ..पर उसके बाद बागेश्वर में सर्विस सेंटर पर ठीक कराया था.....
      आगे जब कभी उधर का कार्यक्रम बनेगा ..आप को जरुर याद करेंगे
      धन्यवाद

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  4. बहुत बढ़िया रही नैनीताल यात्रा ...एक बार फिर से आपकी कलम द्वारा घूम लेते है .....दिल्ली में हमारे साथ भी यही हुआ था उस दिन रानीखेत एक्सप्रेस गाडी पुरे एक घंटे देरी से आई थी और हमारी गाडी १२ नंबर प्लेटफार्म पर ही आई थी ....खुबसूरत चित्र ,...आपके हर चित्र मेरे चित्रों से अलग होने के कारण और भी अच्छे लग रहे है आगे की यात्रा का इन्तजार रहेगा ...

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    1. टिपण्णी के लिए धन्यवाद दर्शन जी...
      जल्द ही अगला लेख आपको पढ़ने को मिलेगा....
      धन्यवाद

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  5. Riteshji, badiya likha hai aapne, ghoomne ka humein bhi shouk hai lekin aapki tarah itna accha likh nahi pata, baharhaal november mein ya to dalhousie-mcloadganj jaane ka plan hai ya phir doon ka.

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    1. धर्मेन्द्र लखवानी जी.... धन्यवाद...!
      मेरे ख्याल से आपको डलहौजी-खजियार-, धर्मशाला-मैक्लोडगंज ही जाना चाहिये ....मेरा घूमा हुआ हैं ...बहुत ही शानदार जगह हैं....आपको वहाँ खूब अच्छा लगेगा..|

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  6. ईद मुबारक !
    आप सभी को भाईचारे के त्यौहार की हार्दिक शुभकामनाएँ!
    --
    इस मुबारक मौके पर आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार (20-08-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  7. गुप्ता जी, नैनीताल यात्रा अच्छी चल रही है।
    लेकिन आपने जो रेलों की धज्जियां उडाई हैं, वो मुझे अच्छी नहीं लगी। आपने लिखा है कि जहां मन चाहा, वहां रोक दिया, ऐसा कभी नहीं होता कि लोको पायलट अपनी मर्जी से ट्रेन को रोक दे।
    रानीखेत एक्सप्रेस तीन घण्टे तक मुरादाबाद स्टेशन पर खडी रही जबकि बाकी ट्रेनें जाती रहीं। इसका जरूर कोई ना कोई तकनीकी कारण रहा होगा। हो सकता है कि मुरादाबाद-रामपुर के बीच में कहीं कोई गडबडी हो। चूंकि उधर ट्रेनों की संख्या बहुत ज्यादा है, बिजली का काम भी चल रहा है, तो एक गडबडी से ऐसा हो जाता है। हो सकता है कि बाकी ट्रेनें चन्दौसी के रास्ते आ जा रही हों।
    कुछ भी हो, स्टेशन स्टाफ से लेकर ट्रेन स्टाफ तक कोई भी अपनी मर्जी से ट्रेन को नहीं रोक सकता। दूसरी बात कि आप तो घूमने निकले थे। आपको कहीं जाकर एक्जाम नहीं देना था कि ट्रेन लेट हो गई और आपका एक्जाम छूट गया। या इस ट्रेन के लेट होने के कारण आपकी दूसरी ट्रेन छूट गई। तीन घण्टे बाद काठगोदाम पहुंच गये, अगर सुबह सही समय पर ही पहुंच जाते तो इन तीन घण्टों में क्या करते? मुझे बताओ कि इन तीन घण्टों में आपकी यात्रा पर कितना असर पडा है? मैं गारण्टी से कह सकता हूं कि कुछ भी असर नहीं पडा होगा।

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    1. जाट जी....
      सबसे पहले तो मेरे लेख पर आने के लिए धन्यवाद....! मैं समझ सकता हूँ....की आपका लगाव रेलवे से कुछ ज्यादा हैं तो आपके मेरे लेख में लिखी गयी बाते अच्छी नहीं लगी...पर मैंने वोही लिखा जो मैंने महसूस किया उस समय ....| आपकी बात सही हैं...कि कोई तकनीकी कारण हो ....पर इससे परेशानी तो यात्रियों को ही उठानी पड़ती हैं | उस समय मुरादाबाद स्टेशन पर दो घंटे में हमे गर्मी और मच्छरों के कारण बहुत परेशानी उठानी पड़ी थी....|
      अब आपका सवाल तीन घण्टों में आपकी यात्रा पर कितना असर पडा है?
      अरे भाई ...यह बात सही की हमारा न तो कोई एग्जाम न ही दूसरी ट्रेन थी....| पर लेट होने से हमें काफी फरक पड़ा ..... मैं कोई आपकी तरह घुमक्कड़ नहीं हूँ.......मेरा यात्रा का कार्यक्रम पूर्णत नियोजित था और चार दिन का था ....| यदि दोपहर में पहुंचना होता तो सुबह की शताब्दी से भी जा सकते थे पर हमे तो सुबह ही पहुचना था....| हमने नैनीताल के आसपास के स्थल के घूमने का कार्यक्रम केवल एक दिन का ही बनाया था उसके बाद आगे का कार्यक्रम कुमाऊ की और भी जगह जाने का था | जो कि हमे सुबह दस बजे शुरू करना था पर गाड़ी लेट होने से हमें यह यात्रा का कार्यक्रम एक बजे हि शुरू हो पाया | इस कारण से हमारे कई स्थल घूमने से रह गए और जो भी घूमे जल्दी-जल्दी में ...और तो और सात ताल पर हम लोग साढ़े छह बजे पहुंचे ......|
      अब आप हि बताये हमें कुछ फरक पड़ा या नही....
      टिप्पणी के लिए धन्यवाद!

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    2. बाप रे! ट्रेन के बारे में जरा सा क्या लिख दिया, नीरज जाट का गुस्सा सातवें आसमान पर !:D भारतीय रेल के समस्त कर्मचारी अपनी पूरी निष्ठा और कर्त्तव्यपरायणता से काम करते हैं, यह बात तो हमारे रेलमंत्री को भी हज़म नहीं होगी। ट्रेन लेट हो जाये तो कई सारे लोगों का ओवरटाइम बन जाता है। वैसे भी, अगर एक बार प्लेटफार्म 12 की उद्‌घोषणा कर दी गई तो उसे ऐन वक्त पर बदलने का क्या मतलब है? यदि इस भगदड़ में दस-बीस लोग मर जायें तो रेलवे का कौन सा अधिकारी जिम्मेदारी अपने सर पर लेगा? मैं तो साफ - साफ कहता हूं कि यह सब रेलवे के अधिकारी सिर्फ अपनी काहिली और भ्रष्टाचार के कारण ही करते हैं। इस चक्कर में अनेक कुली और ठेली वाले एक्स्ट्रा कमाई कर लेते हैं! हर गलती को तकनीकी फाल्ट के पीछे छिपा देने से जनता को काफी बेवकूफ बनाया जा चुका है, अब और नहीं ! Staff Accountability fix होनी चाहिये पर यहां तो ट्रेन एक्सीडेंट के मामलों में भी accountability फ़िक्स नहीं की जाती ! जांच आयोग बनते जरूर हैं पर किस ने क्या रिपोर्ट दी, जनता को कभी नहीं बताया जाता। किस को सजा हुई, यह तो पूछना ही मूर्खता है।

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    3. प्रिय सुशान्त जी....
      आपने जो कुछ बाते लिखी वो सब सोलह आने सच हैं.....और बिल्कुल सही कहा आपने जी |
      धन्यवाद...

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  8. ये कोई ब्लॉग नहीं है , आपने पूरी यात्रा को ही जीवंत करके उतार दिया |
    अच्छा लगा पढ़कर , ऐसा लग रहा था मानो मैं ही उस ट्रेन में बैठा हूँ |
    अपना लिंक देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद |
    मुझे भी घूमना बहुत पसंद है लेकिन अभी पढ़ाई की वजह से शायद ज्यादा हो नहीं पाता | कोशिश करूँगा कि मैं भी कुछ समय अपनी इस रूचि के लिए निकाल सकूँ |
    उम्मीद करता हूँ तब तक आप अपने जीवंत यात्रा विवरण के जरिये मेरी घुमक्कड़ी की जिजीविषा को जिन्दा रखेंगे |

    -आकाश

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    Replies
    1. हेलो आकाश !
      आपका इस यात्रा ब्लॉग स्वागत हैं....| यात्रा लेख की प्रशंसा करने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद ....|
      अच्छा लगा जानकर की आप भी घूमने के शौक़ीन हो....| कोशिश करो की छुट्टिया के दिनों में कही घूमने जाओ...|
      आपकी उम्मीद पर कायम रहेगे....आपको समय-समय पर मेरे यात्रा विवरण मिलते रहेगे ....|

      -रीतेश

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