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Sunday, February 26, 2012

Around Udaipur- हल्दीघाटी,श्री नाथद्वारा,एकलिंगजी (Haldighati,Nathdwara & Eklingji)_Part-4

पिछले लेख से आगे। संग्रहालय घूमते समय हम लोग चलचित्र (Light & Sound Show Hall)वाले हॉल में जा पहुचे और यहाँ पर हमारे बस के “फतेहसागर लेक” ग्रुप के सभी लोगो की इकट्ठा कर दिया गया था। हॉल में मेवाड़ और हल्दीघाटी का इतिहास, महाराणा प्रताप के युद्ध कौशल आदि के बारे में चलचित्र (Light & Sound Show) के माध्यम से प्रदर्षित किया गया। इस चलचित्र के प्रदर्शन समय लगभग १० मिनिट का था और इस हॉल में बैठने के लिए लकड़ी के बेंच की व्यवस्था भी थी। हॉल से निकलने के बाद संग्रहालय के और कई कमरे हमने देखे, सभी कमरे मेवाड़ और राजस्थान की एतिहासिक वस्तुए से संगृहीत थे। संग्रहालय के कमरे के बाद एक खुले स्थान पर गुलाब के फूलो से गुलाबजल बनाने की विधि का प्रदर्शन हो रहा था, साथ में ही एक आयुर्वेद उत्पाद दुकान थी, जहाँ से हमने गुलाबजल और गुलुकंद ख़रीदा। इस संग्रहालय में छोटा किन्तु सुन्दर एक कृत्रिम सरोवर था और उसमे में गिरता हुआ एक पानी का झरना मन को और भी लुभा रहा था। सरोवर के किनारे और कुछ सरोवर के पानी में तरह-तरह की मूर्तिकला माध्यम से सुन्दर द्रश्य का प्रदर्शन किया गया था। इस छोटे से सरोवर में पैडलबोट (पैर की सहायता से चलने वाली नौकाए)की भी व्यवस्था थी। 

आप भी नीचे दिए कुछ और सुन्दर चित्रों के माध्यम से संग्रहालय का अवलोकन कर सकते हैं:

संग्रहालय के अन्दर एक सरोवर पर बना पुल और पीछे बहता झरना।

संग्रहालय के अन्दर सरोवर पर  कालिया नाग के ऊपर नाचते भगवान श्री कृष्ण का एक द्रश्य



संग्रहालय में बैल की साहयता से गन्ने का रस निकलते हुए
संग्रहालय घूमते-घूमते लगभग दोपहर के एक बज चुके थे और अब भूख भी सताने लगी थी। इस भूख को मिटाने की भी व्यवस्था इस संग्रहालय के अंतिम छोर पर मौजूद में भोजनालय में थी। भोजनालय में ८० रूपये थाली में “एक व्यक्ति के लिए एक थी थाली” की शर्त पर भरपेट भोजन उपलब्ध था, और भोजन भी अपनी इच्छानुसार वहाँ पर रखे बर्तनों में से स्वयं परोसना था। खाने में उस समय मेन्यू “कड़ीचावल,दाल,एक सूखी सब्जी,एक रसीली सब्जी,सलाद और चपाती” था। संग्रहालय का भोजनालय साफ़ सुधरा, अच्छे माहौल में था। भरपेट भोजन करने के पश्चात हम लोग संग्रहालय से बाहर आकर बस में बैठ गए, धूप बहुत तेज पड़ रही थी और अब गर्मी भी हो गयी थी।
संग्रहालय के बाहर दिखती हल्दीघाटी की पहाड़िया

बस में सभी सवारियों के बैठ जाने के बाद बस हल्दीघाटी स्थित प्राचीन रणमुक्तेश्वर महादेव मंदिर पहुच जाते हैं, यहाँ पर महादेव जी शिवलिंग रूप में एक छोटी गुफा में स्थित हैं। गुफा के बाहर एक छोटी पहाड़ी से एक अतिसुन्दर पतली जलधारा अनवरत नीचे गिरती जा रही हैं। गाइड में बताया की “इस जलधारा के स्त्रोत का कोई पता नहीं हैं की यह पानी कहा से बहकर आ रहा, इसका पानी अतिशुद्ध, पीनेयोग्य हैं और गंगाजल के तरह रखने पर कभी खराब नहीं होता।” रणमुक्तेश्वर महादेव का अपना एक एतहासिक महत्व भी हैं,क्योकि हल्दीघाटी युद्ध के दौरान महाराणा प्रताप इस गुफा में युद्ध के समय रुका करते थे और गुप्त मंत्रणा किया करते थे। इसलिए इसे “प्रताप गुफा” के नाम से भी जाना जाता हैं। यहाँ पर रहने वाले पुजारियों द्वारा प्रतिदिन महादेव जी की पूजा-अर्चना की जाती हैं। मंदिर में भगवान भोले नाथ जी दर्शन करने और कुछ समय मंदिर में व्यतीत करने के बाद, हम लोग यहाँ से बस द्वरा अपने आगे की यात्रा पर चल देते हैं।

रामेश्वर मंदिर स्थित अनवरत चलती जलधारा। इस जलधारा के स्त्रोत का कोई पता नहीं था।

प्रताप गुफा इस रामेश्वर मंदिर के अन्दर जाकर स्थित हैं। जहाँ पर महाराणा प्रताप अपनी गुप्त मंत्रणा किया करते थे।

चेतक स्मारक, हल्दीघाटी । यहाँ पर महाराणा प्रताप के वफादार घोड़े चेतक ने अपना दम तोडा था
रणमुक्तेश्वर महादेव मंदिर के दर्शन करने के बाद हम लोग पहुच जाते हैं, चेतक स्मारक पर। चेतक स्मारक वो स्थान हैं; जहाँ पर प्रताप जी को एक बड़ा नाला पार करते समय घायल चेतक की मृत्यु हो गयी थी। बाद में प्रताप जी ने अपने प्यारे वफादार घोड़े की स्मृति में यहाँ पर एक स्मारक बनवा दिया। स्मारक देखने बाद हम लोग बस द्वारा हल्दीघाटी की सबसे ऊचाई पर स्थान हल्दीघाटी दर्रे पर पहुच जाते हैं। यह रास्ता पहाड़ को काट का बनाया गया नया रास्ता हैं और यह रास्ता राजसमन्द जिले में स्थित नाथद्वारा धाम को जोड़ता हैं। नए रास्ते के साथ में ही नीचे पुराना तंग रास्ता भी दिख रहा था जो अब आने जाने व देखने के लिए बंद कर दिया गया हैं। हल्दीघाटी दर्रे कि दोनों ओर कि पहाड़ी देखने में तो लाल रंग की नज़र आती हैं,किन्तु यदि पहाड़ी की मिट्टी को किसी चीज से खुरचा जाये तो अंदर से इसका हल्दी की तरह पीला नज़र आता हैं, यहाँ की मिट्टी हल्दी जैसे रंग की होने के कारण इस घाटी का नाम “हल्दीघाटी” पड़ा।

हल्दीघाटी में पहाड़ो की मिटटी का रंग बहार से तो लाल हैं पर खुरचने पर हल्दी की तरह पीला दिखाई देता हैं

हल्दीघाटी दर्रे को पार करने के कुछ देर बाद हम लोग “शाही बाग” पहुच जाते हैं। शाहीबाग वो स्थान हैं; जहाँ पर हल्दीघाटी युद्ध के समय मुगलों (अकबर की शाही सेना) ने अपना डेरा डाला था और युद्ध अभ्यास किया करते थे। वर्तमान में हल्दीघाटी स्थित शाहीबाग स्थानीय लोगो अतिक्रमण की लपेट में है, शाहीबाग के इर्द गिर्द कई दर्जन से ज्यादा गुलकंद, गुलाबजल ,गुलाब के फूल आदि की दुकाने, गुलाब की खेती एवं काफी आबादी भी बस चुकी है। राजस्थान सरकार ने इस पर अंकुश लगाने, ऐतिहासिक महत्व रखने वाले शाहीबाग वाले स्थान पर एक खूबसूरत बगीचा विकसित कर दिया हैं।
शाही बाग से आगे बढ़ने पर हल्दीघाटी के अंतिम छोर पर स्थित खमनोर गाँव आ जाता हैं। यहाँ पर स्थित हैं, रण भूमि “रक्त तलाई”। राजपूतो द्वारा मुगलों को शाहीबाग से खदेड़े जाने पर खमनोर गाँव इस मैंदान पर मुगलों और राजपूतो के बीच भयंकर संग्राम हुआ था, और एक समय राजपूत यहाँ पर मुगलों की बड़ी सेना से घिर गए थे। झालामान और कई राजपूत इस संग्राम में वीरगति को प्राप्त हो गए थे। हल्दीघाटी के इस युद्ध में इतना रक्त बहा कि “रक्त का ताल” बन गया और तभी इस मैदान को “रक्त तलाई” के नाम से जाना जाने लगा। ऐतिहासिक रणक्षेत्र “रक्त तलाई” राजस्थान सरकार के पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित किया गया है। हल्दीघाटी युद्ध में वीरगति को प्राप्त राजपूतो के स्मारक स्वरुप उनकी छत्रिया, एक सुन्दर बगीचे के मध्य में बनी हुई हैं। रक्ततलाई घूमने के बाद ऐतहासिक हल्दीघाटी की हमारी यात्रा यही समाप्त हो जाती हैं, और अब हम बढते हैं,अपनी धर्मिक स्थानों की यात्रा “श्रीनाथद्वारा” कि ओर। बस द्वारा खमनोर गाँव से निकलने के बाद कुछ देर कि बस यात्रा करने के बाद हम लोग राष्ट्रीय राजमार्ग ४८ (NH48) स्थित नाथद्वारा पहुँच जाते हैं।

श्री नाथद्वारा (NATHDWARA) धाम :

नाथद्वारा अरावली पर्वत माला के मध्य राजस्थान राज्य के राजसमन्द जिले के अंतर्गत राष्ट्रीय राजमार्ग ४८ (NH48)पर उदयपुर के उत्तर दिशा में बनास नदी के किनारे स्थित हैं। नाथद्वारा कि दूरी उदयपुर से ४८ किमी.(48KM),राजसमन्द से १७ किमी.(17KM),एकलिंग जी से २६ किमी(26KM),दिल्ली से ६८५ किमी (685KM) ओर जोधपुर से २२५ किमी (225KM) हैं। नाथद्वारा का निकटम सुविधाजनक रेलवे स्टेशन मालवी रेल जंक्शन हैं।
नाथद्वारा का अर्थ हैं “भगवान के घर का दरवाज़ा”। प्रभु श्रीनाथजी (श्री कृष्णजी भगवान का गोबर्धन पर्वत उठाये मुद्रा में); नाथद्वारा शहर के मध्य घने बाजार में एक भव्य विशाल मंदिर में विराजमान है, जिसे “श्रीनाथ जी कि हवेली” के नाम से भी जाना जाता हैं। यह मंदिर करीब ३३७ साल पुराना और करोड़ो लोगो कि आस्था का प्रतीक हैं। हर साल लाखो लोग प्रभु श्रीनाथ जी के दर्शन के लिए आते हैं, और उत्सवों जैसे श्री कृष्णजन्माष्टमी, होली आदि में यहाँ भीड़ बहुत हो जाती हैं । नाथद्वारा में यात्रियों के रहने के लिए होटल और धर्मशालाओ की भरपूर और अच्छी व्यवस्था हैं । 
श्रीनाथजी दर्शन समय सारिणी (Shri Nath ji Darshan Time Table)
श्री नाथद्वारा का इतिहास :मुगलों के शासनकाल में बादशाह औरंगजेब ने हिन्दुओ से रुष्ट होकर अपने सैनिको को हिंदू देवी देवताओ कि मूर्ति तोड़ने और हिंदू मंदिरों को नष्ट करने कठोर आदेश दे दिया और इस आदेश का पालन करते हुए मुग़ल सैनिक हिंदू मंदिरों को खंडित करने लगे। इधर मथुरा, वृन्दावन के पास स्थित श्री गिरिराज (गोबर्धन) मदिर के गुसाई जी ने औरंगजेब कि इस आदेश के बारे में सुना और श्रीकृष्ण भगवान (श्री नाथजी) को सुरक्षित स्थान पर ले जाने का निर्णय लिया। निश्चित तिथि पर गुसाई जी ने प्रभु को एक रथ में विराजमान करके भक्तो के साथ सुरक्षित स्थान कि और चल दिया। रास्ते में कई नगर (आगरा,कोटा,जोधपुर) पड़े और गुसाई जी ने वहाँ के राजा से प्रभु को उनके नगर में प्रतिस्थापित करने का आग्रह किया, पर किसी भी नगर के राजा ने औरंगजेब के डर से प्रभु अपने यहाँ स्थापित करने को राजी नहीं हुए। इस तरह रथ आगे बढता रहा और मेवाड़ सीमा में प्रवेश करने के बाद एक सिन्हाड़ नाम गांव में रथ का पहिया फँस गया, कई कोशिश करने के बाबजूद वो पहिया वहाँ से नहीं निकाला जा सका। प्रभु कि इच्छा जानकर, गुसाई जी ने प्रभु को मेवाड़ के राजा कि साहयता से उसी स्थान पर प्रभु कि स्थापना कर दी, बाद में यही जगह प्रभु श्री नाथ के धाम “श्रीनाथद्वारा” के नाम से प्रशिद्ध हुआ । नाथद्वारा में प्रभु श्रीनाथजी के दर्शन पहले निर्धारित समयानुसार आठ चरणों में आठ स्वरूपों के साथ कुछ मिनिटो के लिए ही होते हैं, और द्रशनार्थियो को उसी समय में प्रभु के दर्शन करने होते हैं । भविष्य में आपकी सुबिधा के लिए श्रीनाथजी के दर्शन की समय सारणी एक फोटो के रूप में इस लेख में लगा दी हैं ।

नाथद्वारा के इतिहास के बाद अब चलते हैं अपनी यात्रा के विवरण पर । बस चालक ने तीन बजे के आसपास हमें नाथद्वारा में राजमार्ग के किनारे पर ही उतार दिया, क्योकि बस शहर के अंदर नहीं जा सकती थी । श्री नाथ जी का मंदिर यहाँ करीब १ किमी दूर था और हमने मंदिर तक जाने के लिए एक ऑटो रिक्शा ५/- रूपये प्रति सवारी पर कर लिया । ऑटो रिक्शा में सवार होकर पांच मिनिट में हम लोग मंदिर पास ऑटो रिक्शा स्टैंड पर पहुँच गए, मंदिर यहाँ से कुछ ही कदम की दूरी पर था । समय लगभग ३.२५ बजे का होगा और इस समय मंदिर दर्शन हेतु बंद था, साथ ही साथ मंदिर के आस पास के सभी भी दुकाने बंद थी । मंदिर के मुख्य दरवाजे पर लगे दर्शन समय सारणी के अनुसार प्रभु के अगले दर्शन का समय ३:४५ बजे उथापन स्वरूप में केवल १५ मिनटों के लिए था । जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा था, वैसे-वैसे ही मंदिर के दरवाजे पर भीड़ बढ़ती जा रही थी । मंदिर के दरवाजा खुलने से दस मिनिट पहले क्लोक रूम खुल गया और हम लोगो ने अपने मोबाइल और कैमरा रशीद लेकर क्लोक रूम में जमा करा दिया क्योकि मंदिर में इन्हें ले जाने की और मंदिर के अंदर फोटो खीचने की आज्ञा नहीं थी । तय समय कुछ पहले पर श्री नाथ जी की हवेली (मंदिर) का मुख्य द्वार खुल गया और अंदर जाकर एक गलियारे में पुरषों व महिलायों को अलग-अलग लाइन में कर दिया गया । मंदिर परिसर के अंदर स्थित श्री नाथ जी कमरे के बाहर के द्वार के दोनों ओर सुन्दर चित्रकारी से हाथी के चित्र बने हुए थे और यह कमरा कुछ सीडिया चढ़ का था । कुछ मिनिट के बाद श्रीनाथ जी कमरे का भी द्वार भक्तो के दर्शन हेतु खोल दिया गया । हम लोगो ने गोबर्धन धारी प्रभु श्रीनाथ जी के मनोहारी श्याम रंग की मूर्ति के उथापन स्वरूप के दर्शन भीड़ में बड़ी मुश्किल से किये, १५ मिनिट बाद मंदिर के द्वार बंद हो गया और सभी लोगो को मंदिर से बहार भेजा जाने लगा । श्री नाथ जी के दर्शन करने के बाद हम लोग मंदिर से बहार आ गए ओर अपने कैमरे ओर मोबाईल अमानती कक्ष से रशीद देकर वापिस लिए । अब मंदिर के आस पास का बाज़ार खुल गया था ओर अधिकतर दुकाने प्रभु श्रीनाथ को पहले से लगाये के भोग (प्रसाद) की व उनके तस्वीर की थी । अधिकतर भक्तगण यहाँ से प्रभु श्री नाथ जी प्रसाद खरीद कर अपने घर के लिए ले जाते हैं । कुछ देर श्री नाथ जी गलियो टहलते रहे ओर कुछ देर बाद हम लोगो ने ऑटो लेकर वापिस बस के पास पहुँच गए । कुछ समय बाद बस के यात्रियों से भर जाने के बाद बस अपने अगले गंतव्य एकलिंग जी को रवाना हो गई । 
प्रभु श्रीनाथजी के विभिन्न स्वरूपों के दर्शन।


श्री एकलिंगजी:
बस द्वारा नाथद्वारा से चलने के लगभग ४५ मिनिट बाद हम लोग कैलाशपुरी स्थित एकलिंगजी पहुच गए। बस ने हमें मंदिर से कुछ दूर पहले प्राचीन इन्द्रसागर नामक सरोवर के पास उतार दिया। कैलाशपुरी स्थित इन्द्रसागर सरोवर में कमल के सुन्दर फूल खिले हुए थे और सरोवर के आसपास श्री गणेशजी, श्री लक्ष्मीजी और कुछ अन्य भगवान के प्राचीन मंदिर बने हुए थे। सरोवर के भ्रमण के बाद हम लोग पैदल ही श्री एकलिंगजी के दर्शन के लिए मंदिर की ओर चल दिए। भव्य और किलेनुमा मंदिर प्रवेश करने के बाद पता चला कि अभी दर्शन खुलने में कुछ समय बाकी हैं, क्योकि मंदिर में श्री एकलिंगजी के दर्शन समयानुसार होते हैं। मंदिर के अंदर किसी भी प्रकार का सामान (जैसे पर्स, बेल्ट, किसी भी प्रकार बैग, कैमरा, मोबाईल, खानेपीने का सामना) ले जाना पूर्णतयः वर्जित था। अपने सामान को सुरक्षित मंदिर से बाहर रखने के लिए मंदिर परिसर में लोहे के लॉकर और ताले की सुविधा थी। हमने ने अपना सारा सामान स्वयं लॉकर में रखा और ताला लगाकर चाबी अपने पास रख ली। एक बात और जब हम किसी मंदिर में जाते हैं, घंटा बजाकर उद्घोष करते हैं और उसके बाद ही प्रभु दर्शन और वंदना करते हैं, पर यह मंदिर थोड़ा अलग हैं, क्योकि यहाँ पर घंटे नहीं बजाये जाते और और न ही किसी आगंतुक को घंटा बजाने की आज्ञा हैं, क्योकि पुजारियों दद्वारा श्री एकलिंग जी कुछ विशेष साधना और पूजा पाठ में बिघ्न पड़ता हैं । मंदिर परिसर का वातावरण शांत और शिवमय था । मंदिर में चढ़ाने के लिए हमने कुछ कमल के फूल (पांच रूपये का एक) ख़रीदे। जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा था, मंदिर में भीड़ भी बढ़ती जा रही थी। दर्शन करने के लिए हम लोग भी पंक्ति में खड़े हो गए । लगभग सवा पांच बजे के आसपास मंदिर के पट खुल गए। धीमे-धीमे पंक्ति आगे बढ़ती रही थी और बारी-बारी से भगवान श्री एकलिंग के दर्शन हो रहे थे । भीड़ अधिक होने के कारण वहां के कार्यकर्ता मुख्य मंदिर के कठघरे के बाहर अधिक देर तक खड़े नहीं होने दे रहे थे, इसलिए थोड़ा जल्दी में हमने दर्शन किये और प्रभु की वंदना की । श्री एकलिंग जी के दर्शन के बाद हम लोगो मंदिर परिसर में निर्मित १०८ मंदिर उपस्थित अन्य देवी देवताओ के दर्शन किये और उनकी वंदना की।
Shri Ekling Ji
Shri Ekling Ji Mahadev (श्री एकलिंग जी महादेव दर्शन)
श्री एकलिंगजी महादेव मंदिर कि उदयपुर से लगभग २२ किमी और नाथद्वारा से लगभग २६ कि.मी. दूर राष्ट्रिय राष्ट्रीय राजमार्ग ४८ (NH48) पर कैलाशपुरी नाम के स्थान पर स्थित हैं। श्री एकलिंगजी पहुँचने के लिए उदयपुर से नियमित बस सेवा उपलब्घ हैं। मेवाड़ शैली में पत्थरो से निर्मित श्री एकलिंगजी उदयपुर और मेवाड़ का संबसे विख्यात और विशाल मंदिर है। श्री एकलिंगजी हमारे आराध्य देव भगवान शिव का प्राचीन मंदिर हैं, यहाँ पर स्थित शिवलिंग की मूर्ति के चारों ओर मुख (चेहरा) बने हुए हैं, अर्थात यहाँ पर भगवान शिवजी एक चतुर्मुखी शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं। एकलिंगजी के चार चेहरों भगवान शिव के चार रूपों को दर्शाते हैं, जो इस प्रकार हैं:-पूरब दिशा की तरफ का चेहरा सूर्य देव के रूप में पहचाना जाता हैं, पश्चिम दिशा के तरफ का चेहरा भगवान ब्रह्मा को दर्शाता हैं, उत्तर दिशा की तरफ का चेहरा भगवान विष्णु और दक्षिण की तरफ का चेहरा रूद्र स्वयं भगवान शिव का हैं। मंदिर के गर्भगृह का मुख्य द्वार पश्चिम दिशा में और गर्भगृह के सामने पीतल धातु से बनी शिव के वाहन नन्दी की मूर्ति है। मंदिर परिसर में १०८ देवी-देवताओ के छोटे-छोटे मंदिर स्थित हैं, और इन मंदिरों के बीच में श्री एकलिंग जी मंदिर स्थापित हैं। मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करने आज्ञा किसी को भी नहीं हैं, श्री एकलिंग जी दर्शन एवं वंदना कठघरे से बाहर रहकर ही करनी पड़ती हैं। एकलिंगजी मदिर में श्री एकलिंगजी का श्रृंगार फूलो, रत्नों नियमित रूप से प्रतिदिन किया जाता है। मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश वहाँ के पुजारियों से आज्ञा लेकर व उनके द्वारा दिए गए विशेष वस्त्र पहनकर ही मिलती हैं। श्री एकलिंगजी मेवाड़ के शासक और राजपूतो के मुख्य आराध्य देव हैं। कहा जाता हैं कि मेवाड़ में राजा तो उनके प्रतिनिधि के रूप में शासन किया करता था। युद्ध पर जाने से पहले राजपूत श्री एकलिंग जी आशीर्वाद जरुर लेते थे। श्री एकलिंगजी मंदिर परिसर में मंदिर के इतिहास कि बारे में जानकारी देता हुआ मंदिर ट्रस्ट का एक बोर्ड लगा हुआ था। जिसमे मंदिर के इतिहास के बारे में कुछ इस प्रकार से लिखा हुआ था।
“मंदिर श्री एकलिंगजी, कैलाशपुरी गांव, अंतर्गत श्री एकलिंगजी ट्रस्ट सिटी पैलेस, उदयपुर। मेवाड़ के शासको के इष्टदेव भगवान शिव का यह निजी मंदिर उदयपुर से २२ कि.मी. उत्तर दिशा में स्थित हैं, एवं देश के अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थो में से एक हैं। मूलतः यह मंदिर आठवीं शताब्दी में बापा रावल दवारा बनाया गया परन्तु आक्रान्ताओ ने उसे आंशिक रूप से नष्ट कर दिया। महाराणा मोकल द्वारा मंदिर का पुननिर्माण प्रारम्भ किया गया। मंदिर के दक्षिण द्वार पर लगी प्रशस्ति के अनुसार मंदिर का वर्तमान स्वरुप महाराणा रायमल (1473-1509) द्वारा प्रदान किया गया। आंतरिक गर्भगृह में स्थित अत्यंत आकर्षक श्याम संगमरमर से शिल्पित चतुर्मुखी शिवलिंग महाराणा रायमल द्वारा पंद्रहवी शताब्दी के अंत में स्थापित किया गया। कठघरे और गर्भगृह के बीच के द्वार पर वर्तमान श्री जी मेवाड़ अरविन्द ने किवाड़ पर चांदी कि परत चढ़वाई हैं। मुख्य मंदिर के कठघरे में आम दर्शनार्थियों का प्रवेश वर्जित हैं।“
एकलिंगजी मंदिर और सभी देवी देवताओ के दर्शन करने का पश्चात हम लोग बस द्वारा राष्ट्रीय राजमार्ग ४८ के खूबसूरत पहाड़ी रास्ते के आनंद लेते हुए लगभग पौन घंटे में उदयपुर में उदयपोल चौक पर शाम के सात बजे के आसपास पहुँच गए। थोड़ी देर उदयपोल के बाज़ार में चहलकदमी करते रहे और वहाँ के चाट भल्ले का लुफ्त उठाया उसके बाद अपने होटल सवेरा पहुंचकर अपना सारा सामान अमानती कक्ष से वापिस ले लिया ।

UDAIPUR TRIP PLAN CHART
Udaipur City Tour Plan Chart
 अभी ट्रेन के चलने में अभी काफी समय बाकी था। बाकी समय बिताने और तरोताजा होने के लिए होटल के मैनेजर ने कुछ घंटो के एक कमरा हमें दे दिया था। कुछ घंटो के आराम करने व तरोताजा होने के बाद अब हम लोग वापिस आगरा जाने की लिए तैयार हो गए । होटल के रेस्तरा में हमने रात का खाना खाया और कुछ पैक भी करा लिया। होटल से रेलवे स्टेशन लगभग १.५ किमी दूर था। रात के दस बजे हम लोगो ने अपना सारा सामान समेटा और एक ऑटो में बैठकर से स्टेशन पहुँच गए । गाड़ी उदयपुर ग्वालियर सुपरफास्ट एक्सप्रेस (Train No.12966) अपने सही समय १०:१५ बजे स्टेशन से आ गयी । हम लोगो के गाड़ी में बैठने के ५ मिनिट बाद गाड़ी चल दी । दिन भर घूमने के कारण हम लोग काफी थक गए थे, इसलिए गाड़ी चलने के कुछ देर बाद ही हम लोग सो गए । रात ने कई स्टेशन निकल गए और सुबह पौने आठ बजे बांदीकुई जंक्शन आने पर हम लोगो की आंख खुली । गाड़ी अपने समय सारणी के अनुसार सही समय से चल रही थी । ठीक १०:५० गाड़ी आगरा के एक स्टेशन ईदगाह जंक्शन पर पहुँच गयी, हम लोग गाड़ी से इसी स्टेशन पर उतर गए और एक ऑटो करके हम लोग अपने घर पहुँच गए । 

Summary of our Tour and Mainly Expenses:
1st Day:We reached Abu Road by Agra Ahmedabad Superfast Express (Train No.12547 ) at early morning. We hired a Taxi and went to Ambaji (Guj.). After darshan of Maa Ambaji , We reached Mount Abu by Same Taxi.we took a room on Rent in a Guest house, Near Golf Field,Mount Abu. We went to Sunset Point on foot in evening.
[Expenses- Room Rent Rs.200.00 at AMBAJI for 3 Hours, Rope Way Charge Rs.80/- per Person at Gabbar-Ambaji, Full day Tax Fair Rs.1400.00 and Room Rent Rs.800.00 at Mount Abu]
2nd Day: We booked tickets of Udaipur Bus for Next Day in The Morning and visited to Local & around Mount Abu (i.e. Shankar Math, Guru Shikhar, Peace Park, Achalgarh, Delwara Jain Temple, Arbuda Devi Temple, Om Shanti Bhawan, Toad Rock) by same Taxi. In the evening, we went to Nakki Lake and enjoyed by Boating in Lake.
[Expenses- Ticket Charge to Udaipur for per person Rs.150.00, Full day Tax Fair Rs.1400.00, Boating Charge Rs.270.00 and Room Rent Rs.800]
3rd Day: Check out room of Guest House at Mount Abu and we left for Udaipur. After reaching Udaipur, We took a room on rent in Hotel Savera at Udaipol. In afternoon, we visited to Local Udaipur City (i.e. Jagdish Temple, Pichola lake, Aravali Vatika, Fateh Sagar Lake, Nehru Garden, Sahelion-ki-Bari, Sukhadia Circle) by Auto Rickshaw. In the Night,we booked tickets in a tourist bus for visiting to Around Udaipur for next day.
[Expenses-A.C. Room Rent Rs.1200, Moti Magri to Nehru Garden Boating Charge Rs.20 Per Person, Two Auto Rickshaw Charge Rs.600]
4th Day: Check out room from Hotel Savera and kept our luggage in Hotel’s Clock Room then we visited to around Udaipur (i.e. Ghasiyar old Nathdwara Temple, Haldighati-Varvasan Mata Temple-Maharana Pratap Museum, Chetak Smarak, Shahi Bagh, Rakt Talai, Nathdwara & Ekling ji Mahadev Temple) and returned back to Udaipur in the evening.In the night, we returned back to Agra by Udaipur Gwalior Superfast Express (Train No.12966).
[Expenses- Tourist Bus Ticket for per person Rs.140 and Ticket at Museum per Person Rs.30]
Mount Abu to Udaipur & Nathdwara Root Chart Map
अब यही पर हमारी माँ अम्बाजी, माउन्टआबू और उदयपुर की सुखद और यादगार यात्रा समाप्त होती हैं। आप लोगो के समक्ष जल्दी ही नया लेख प्रस्तुत करूँगा । धन्यवाद !

8 comments:

  1. सही है भाई दोनों जगह लगे रहो।

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    1. संदीपभाई जी
      हमारी निजी साईट यह मेरा ब्लॉग ही हैं ...जहाँ मैं अपना लेख लिखता हूं...उसके बाद इस ब्लॉग पर और घुमक्कड़.कॉम दोनों पर चिपका देता हूं..
      और आप बताए आपका क्या हाल चाल हैं
      रीतेश

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  2. अच्छा है आपका ब्लाग रितेश जी । ऐसे ही घूमते ​रहिये और लिखते ​रहिये

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    Replies
    1. धन्यवाद मनु जी........आपकी अगली पोस्ट कब आ रही हैं..

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  4. बहुत बढ़िया रितेश भाई ! पिछले जनवरी में मैं भी परिवार सहित हो आया उधर ! श्रीनाथ मंदिर की व्यवस्था मुझे बिलकुल पसंद नहीं आई ! वो शायद जानबूझकर भीड़ बढ़ा लेते हैं और जब भीड़ है तो दर्शन अच्छी तरह से नही हो पाते ! सुन्दर वर्णन ! चित्रों के तो कहने ही क्या

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